गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
मेरा गाँव पूरा गांव अपना था , आम ,महुआ , पीपल , नीम का छांव अपना था , बस तुम अजनबी थे | पूरे गांव के लोग अपने थे , कुआं , गड़ही ,पोखर , दूर तक फैला ताल अपना था , बस तुम अजनबी थे | पूरे खेत - खलिहान अपने थे , ओल्हापाती , चिक्का गोली ,गिल्ली डण्डा , खेल सामान अपने थे , बस तुम अजनबी थे | अब तुम अपने हो , सब अजनबी हैं | तुम (नौकरी ) अजनबी हो जाओ ||