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ससुराल की बखान

ससुराल की बखान एक ब्याहता बेटी जब अपने पीहर लौटती है , तो सभी भेंटहारन धीरे -धीरे अपने घर को चली जाती हैं, मां पास में  बैठी होती है और पूछती है,  बोल बिटिया ससुराल में सब केईसन बा... तो बिटिया अपनी माँ की जिज्ञासा का शमन गेय भोजपुरी संवाद में  करती है....(यह संवाद उस समय का है जब मां और बिटिया के पास फोन नहीं था ) “अपनै अपन करीं केतनी बखान हो, सासु मोरी धरती, ससुर असमान हो। “जेठउत त हमरे ससुर के दुलरुआ, गंगा अस निरमल हमरी जेठान हो।” “लहुरा देवरूआ हमरी अँखिया के पुतरी, सासु जी के अँचरा के कोनवां परान हो।” “ननदी हमार पुनवासी के अँजोरिया, सईंया मोर उगें जइसे सुरुज बिहान हो।” “नइहर मोरा जइसे जल भर बदरा, मोरे ससुरे वइसे लहरै सीवान हो।”                 प्रथम पंक्ति में लड़की कहती है कि मैं  अपने से अपना वर्ण कैसे करूं ... और आगे कहती है की मेरी सासू माँ  तो इतनी धैर्यवान है , जितना धरती , पृथ्वी इतना विशाल ह्रदय और धैर्य वाली हैं,  मेरी सासू माँ |  ससुर जी का वर्णन करते हुए कहती है कि मेरे ससुर जी तो आकाश की तरह विशाल...
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नया वर्ष के नाम पत्र

 नवका साल के नामे चिट्ठी  प्रिय नवका साल  सादर प्रणाम      का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस   के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।  जरूरत है सियासत की ,  लोगों  को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।  तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है ,  असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं।  सजग रहना ऐ मूल निवासियों,  तुम्हारे बीच से  ,          विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार,  बे खौफ पसारे जा रहे हैं।  रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं।  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।     विरंजय १८/११/२०२५

मेरा गाँव

मेरा गाँव    पूरा गांव अपना था , आम ,महुआ , पीपल , नीम का छांव अपना था , बस तुम अजनबी थे | पूरे गांव के लोग अपने थे , कुआं , गड़ही ,पोखर , दूर तक फैला ताल अपना था , बस तुम अजनबी थे | पूरे खेत - खलिहान अपने थे , ओल्हापाती , चिक्का गोली ,गिल्ली डण्डा , खेल सामान अपने थे , बस तुम अजनबी थे | अब तुम अपने हो , सब अजनबी हैं | तुम (नौकरी ) अजनबी हो जाओ ||

सरकार तुम्हारी क्या बोलें

  सरकार तुम्हारी क्या बोलें  गंगा की सफाई , क्या बोलें ? रोजी औ कमाई , क्या बोलें ? बबुआ की पढाई , क्या बोलें ? रोगी की दवाई, क्या बोलें ? सरकार तुम्हारी,  क्या बोलें ? हर दम महंगाई,  क्या बोलें ? खेती औ सिंचाई, क्या बोलें?  यूरिया औ डाई  क्या बोलें ? सरकार तुम्हारी,  क्या बोलें ? बबुनी की पढाई , क्या बोलें ? बेटी की सगाई,  क्या बोलें ? चिंता है विदाई,  क्या बोलें ?  सरकार तुम्हारी,  क्या बोलें ? अब बोल तुम्हारी,  क्या बोलें ?  जनता अंगड़ाई,  क्या बोलें ? यूपी अब पूछे , क्या बोलें ? गुजरात कहे है , क्या बोलें ? बिहार चीखता , क्या बोलें  ? चहुओर हहाकार , क्या बोलें ?  सरकार तुम्हारी,  क्या बोलें ? उत्तर से दक्षिण , क्या बोलें ? पूरब से पश्चिम,  क्या बोलें ? विष घोल रहे सब , क्या बोलें ? जाति -धर्म पर,  क्या बोलें ? सरकार तुम्हारी,  क्या बोलें ? ना रोक सको तो,  क्या बोलें ? छोड़ो सिंहासन,  क्या बोलें ? इस लोकतंत्र में,  क्या बोलें ? जनता है मालिक , क्या बोलें  ? सरकार तु...

ईश्वर पईठा दलीद्दर निकले

  ईश्वर पईठस दलीद्दर निकलस दीपावली की बिहाने . भोरे -भोरे दरिद्दर खेदल जाला सभे कजरवटा से डाली - दउरी पर एगो ताल की साथ ठोक -ठोक के कहल जाला , ईश्वर पइठस दलीद्दर निकलस .. पहिले पूरा टोला क मेहरारू आ मरद एक साथ निकल के आ दलिद्दर के एक जगह चौराहा पर फूंक -ताप के काजर पार के आ गीत गावत लौटस जा .. अब उ समय कहाँ बा अब त न डाली दौरी बा आ ना उ सनमत बा , अब लोग साड़ी के डिब्बा प छड़ बे बजावत जात बा आ जहां मन क ईलस होही जा फूंक ताप के चल आइल ... इ समाज कहाँ जात बा  ❓

सियासी दिये और सियासी बधाई

 दिये और सियासी बधाई  जल गये सब दिए भर गयी रोशनी  , अंधेरा बेचारा  स्वयं राह भूला  , झालरें सज रही हैं  , विदेशी धरा की , क्यों लाते हो घर में बेबसी का ये झूला , अगर दीप रखते कुम्हारी कला के ,  धरा स्वर्ग छूती ये मिट्टी जनम की , वो कोना भी सजता स्वदेशी धरा का,  दिखती वो खुशिया दिवारी , मिठाई , जरा तुम भी देखो व समझो निकट से , किसकी ये गलती है किसकी ढिठाई , आंखे तो जिनकी दिखती नहीं हैं,  भारत को उसने भी आंखें दिखाई , तज दो वो झालर , विदेशी सजाई , मुबारक उन्हें हो सियासी सगाई , सियासी पटाखे , सियासी खुशी , सियासी मिठाई , सियासी बधाई,  रखो घर की देहर पर  देशी दिये ये ,  जिसमें स्वदेशी महक हो समाई , भरो प्रेम घी से ये दीपक लबालब , बाती रखो स्नेह लिपटी दिया बीच , अंधेरे की हिय से अब कर दो विदाई , मुबारक हो सबको  आगमन राम का , दिवाली की सबको भर -भर के बधाई ||             सर्वाधिकार सुरक्षित                विरंजय (२०/१०/२०२५) भिलाई , छ०ग०