गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
किसान का धान आपदा नहीं विपदा में
किसान धान की फसल लगाया पूरी लागत के साथ, खाद, मजदूरी, दवा, निराई -गुड़ाई, सब बेहतर ढंग से की गई, ऊपर से इन्द्रदेव मेहरबान थे समय - समय पर जल आपूर्ति सही रखे जिससे सिंचाई की जरूरत कम पड़ी | धान की फसल बहुत बढ़िया उतर आयी |धान की बढ़वार बढिया हुयी,बालियां सुनहरी हो चली परन्तु प्रकृति जनित आपदा नहीं अपितु मानव जनित विपदा ने धान की फसल को रसातल को भेज दिया | गाँव को विकास के पर लगाने, मनरेगा की राशि खपाने की औपचारिकता ने अनियोजित चक रोड खूब बनाए, जिससे पूरा जोत व बसावट छोटे -छोटे अनचाहे सेक्टरों में बंट गया| नतीजा यह निकाला की बारिश का पानी जहाँ का तहाँ जमा रहा |क्योंकि उन लालची और गैर किसान ठीकेदार नीचों द्वारा चक रोड में जलनिकासी हेतु कोई व्यवस्था नहीं बनायी, पुलिया अथवा नाली नहीं बनवायी | बची कोर कसर नाले (बहा) के जाम रहने ने पूरा कर दिया जिसको विकास खण्ड तथा जिला पंचायत ने मई-जून के माह में साफ -सफाई के नाम पर धन आहरित कर बांट लिया था | अब पूरी फसल जलमग्न है, धान गिरा हुआ है अब सरकार को भी राहत है, पराली जलाने से भी निजात और धान के क्रय का भी दबाव नहीं |
अब उम्मीद है कि किसानों की आय दोगुनी होने में अब देर नहीं..... लगेगी..
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