Skip to main content

Posts

Showing posts with the label आप की बात आप से (एक संस्मरण)

नया वर्ष के नाम पत्र

 नवका साल के नामे चिट्ठी  प्रिय नवका साल  सादर प्रणाम      का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस   के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...

औचक निरीक्षण या अनौपचारिक अथवा पर्यवेक्षण

  खण्ड शिक्षा अधिकारी ने जब दौरा किया  आज अचानक कहूं की औचक कहूं या अनौपचारिक (informal ) कहूं निरीक्षण (inspection ) हुआ हमारे विद्यालय का , नहीं निरीक्षण कहना न्यायसंगत न होगा | हमारे विद्यालय का आज पर्यवेक्षण (Supervision ) हुआ  | हमारे विद्यालय के मुख्य द्वार में ताला बंद करने की परम्परा नहीं  , विद्यालय में अनुशासन और  सजगता के कारण बच्चों का अनचाहा पलायन भी नहीं होता सो विद्यालय का द्वार सामाजिक अंतर्क्रिया हेतु हमेशा खुला रहता है  , आज एक बाईक विद्यालय परिसर  के ठीक मध्य में ठहर गई | * * विकास खण्ड जमालपुर के विद्वान  खण्ड शिक्षा अधिकारी  श्रीमान देवमणि पाण्डेय जी अपनी दैनन्दिनी मुझे हस्तगत करते हुए कक्षा-कक्ष  की ओर बढ़े और सीधे बच्चों से अन्तर्क्रिया (Interaction ) आरम्भ कर दिए  -  सर्वप्रथम दर्जा जानने के बाद,  कक्षा का  न्यूनतम अधिगम स्तर * * आकलन करने लगे , फिर  यादृच्छिक रुप से विद्यार्थी का न्यूनतम अधिगम स्तर आकलित करते और  फिर यथोचित पुनर्बलन प्रदान करते हुए , बच्चों के प्रदर्शन व उपस्थिति स...

लंच बॉक्स और अंचार पराठे

  अंचार और पराठा                                                  Source   Image internet                             नींव का  निर्माण     यह भी पढें एक वह भी समय था स्कूल की घंटी दूर तक सुनाई देती थी , दौड़ कर स्कूल पहुंचना और थोड़ा सा विलम्ब होने पर गेट बंद होना ,अब दोनों तरफ मुसीबत स्कूल में पिटाई और घर लौटे तो कुटाई | अब वह दौर नहीं रहा अब तो दरवाजे पर पीले रंग की  मार्कोपोलो स्कूल बस खड़ी हो जाती है और मम्मी बस्ता लेकर सहायक परिचालक (खलासी)को थमाती हैं  बच्चा स्कूल पहुंचता है | लंच बॉक्स                             Source   Image internet  हमारे समय तक फाइवर (प्लास्टिक )और  स्टील के  लंच बॉक्स (टिफिन ) चलन में आ गये थे |  मेरी फटी कमीज यह भी पढें मध्य...

थप्पड़

थप्पड़ से मैं  धन्य हो गया  गर्मी का मौसम था रात का नौ बज रहा था सड़क पर वाहन फर्राटे भर रहे थे ,कुछ  निजी वाहन ,कुछ  सवारी ढोने वाले वाहन उसी में  बुजारथ ड्राइवर (मुसहर - यह वनवासी जाति है) अपनी गाड़ी में  सवारी भर कर गाजीपुर  टैक्सी स्टैंड से दुल्लहपुर (लगभग 40 किलोमीटर )तक के लिए  निकला  था | यह प्रतिदिन का काम था परन्तु आज सवारी  देर से मिलने के कारण अंधेरा हो गया  |अब दिक्कत ये थी की  गाड़ी की बत्ती  भी खराब हो गई थी | बुजारथ ड्राइवर  बिना लाईट की सवारी गाड़ी  लिये बहुत  प्रसन्नता  और थोड़ी सी बाधा के साथ  आपने गन्तव्य की तरफ बढ़ रहा था | प्रसन्नता इस बात की थी कि सवारी  गाड़ी और  गाड़ीवान की औकात से अधिक थी टैक्सी स्टैंड पर लगन (वैवाहिक कार्यक्रम ) का समय होने के कारण  वाहन कम थे जिसका फायदा बुजारथ ड्राइवर को मिला सबको घर जाने की जल्दी थी इसलिए  सवारी ऐसे बैठाइ गयी अथवा यूं कहूं ठूसी   गयी की तिल रखने की जगह न बची थी ,गाड़ी के ऊपर तक सवारी और  दाहिने -बांए त...

किसको बात बताऊं किससे दुखड़ा गाऊं

 किसको बात बताऊं किससे दुखड़ा गाऊं- अब मैं अपराध मुक्त हूं किसको बात बताऊं अपनी , किससे दुखड़ा गाऊं , बचपन बीता कब ना जाना, ठहरी कब ये जवानी , सोच - सोच मैं , पहर -पहर भर आंखों में ले पानी , सबने अधरों के घेरों से आंका , पीर किसी ने  न झांकी , पानी कितना गुजर गया कितना अभी है बाकी, इतना आगे मैं निकल गया,लौट कहां अब जाऊं | किसको बात बताऊं किससे दुखड़ा गाऊं ||                  इसे साहस कहूं या बद्तमीजी        © -           Viranjay Singh Journalist  नोट - यह पीड़ा मेरी स्वयं की व्यक्तिगत और  नितांत व्यक्तिगत है ,उपलब्धियों की तुला पर मेरी व्यथा-कथा को तौलोगे तो हाथ कुछ नहीं आएगा ||

मृतक दादा जी की ऋण अदायगी

मृतक दादा जी                          फाईल फोटो  दादा जी का स्वर्गवास हुए दो वर्ष बीत गये  | मेरे दादा जी  स्व० शिवप्रसाद चौधरी  ,जिनका मूल नाम तो शिव प्रसाद था  परन्तु  पांच गांव में पंचायत के सरपंच होने के कारण उनके नाम के पीछे लोग सम्मान में  चौधरी लगाकर बुलाते थे  | दादा जी की ३ वारिस  संतानो में मेरे पिता जी जो सबसे बड़े थे  घर पर खेती -  बारी कराते ,एक चाचा जी उनका सहयोग करते हुए अप्रत्यक्ष बेरोजगारी के जीते-जागते उदाहरण  हैं क्योंकि इस कल युग (मशीनी युग ) में  सबकुछ  तकनीकी और  मशीन  से   खेती होने के कारण सब एक व्यक्ति आसानी से कर सकता  है  | बचे एक चाचा जी जो अहमदाबाद में एक अच्छे व्यसायी हैं  ,परन्तु वे शुद्ध व्यापारी हैं,व्यवहारी  नहीं | इतनी भूमिका बतना आवश्यक है, क्योंकि हमारे कुनबे को बिना जाने आगे आप से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती | दादा जी का ऋण (KCC) दादा जी की अवस्था लगभग अस्सी (80) के पार हो ...

इसे साहस कहूँ या बद्तमीजी

इसे साहस कहूँ या     उस समय हम लोग विज्ञान स्नातक (B.sc.) के प्रथम वर्ष में थे, बड़ा उत्साह था ! लगता था कि हम भी अब बड़े हो गए हैं ! हमारा महाविद्यालय जिला मुख्यालय पर था और जिला मुख्यालय हमारे घर से 45 किलोमीटर दूर!  जिन्दगी में दूसरी बार ट्रेन से सफर करने का अवसर मिला था और स्वतंत्र रूप से पहली बार  | पढने में मजा इस बात का था कि हम विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी थे, तुलना में कला वर्ग के विद्यार्थियों से श्रेष्ठ माने जाते थे, इस बात का हमें गर्व रहता था! शेष हमारे सभी मित्र कला वर्ग के थे ,हम उन सब में श्रेष्ठ माने जाते थे परन्तु हमारी दिनचर्या और हरकतें उन से जुदा न थीं! ट्रेन में सफर का सपना भी पूरा हो रहा था, इस बात का खुमार तो कई दिनों तक चढ़ा रहा! उसमें सबसे बुरी बात परन्तु उन दिनों गर्व की बात थी बिना टिकट सफर करना   | रोज का काम था सुबह नौ बजे घर से निकलना तीन किलोमीटर दूर अवस्थित रेलवे स्टेशन से 09.25 की ट्रेन पौने दस बजे तक पकड़ना और लगभग 10.45 बजे तक जिला मुख्यालय रेलवे स्टेशन पहुँच जाना पुनः वहाँ से पैदल चार किलोमीटर महाविद्यालय पहुंचना! मतल...