गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
किसको बात बताऊं किससे दुखड़ा गाऊं-
किसको बात बताऊं अपनी , किससे दुखड़ा गाऊं ,
बचपन बीता कब ना जाना, ठहरी कब ये जवानी ,
सोच - सोच मैं , पहर -पहर भर आंखों में ले पानी ,
सबने अधरों के घेरों से आंका , पीर किसी ने न झांकी ,
पानी कितना गुजर गया कितना अभी है बाकी,
इतना आगे मैं निकल गया,लौट कहां अब जाऊं |
किसको बात बताऊं किससे दुखड़ा गाऊं ||
© -
Viranjay Singh Journalist
नोट - यह पीड़ा मेरी स्वयं की व्यक्तिगत और नितांत व्यक्तिगत है ,उपलब्धियों की तुला पर मेरी व्यथा-कथा को तौलोगे तो हाथ कुछ नहीं आएगा ||

अद्भुत
ReplyDeleteरहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय,
ReplyDeleteसुन अठिलैहें लोग सब , बांटी न लैहें कोय ||