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नया वर्ष के नाम पत्र

 नवका साल के नामे चिट्ठी  प्रिय नवका साल  सादर प्रणाम      का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस   के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...

जब लोहिया जी ने पांच में से तीन रुपए लौटाया..

जब लोहिया जी ने पांच  में से तीन रुपए लौटाया.. 
   समाजवादी विचारक जिन्होंने कहा, " क्रांति टुकड़े में नहीं लाई जा सकती " उनके कहने का आशय था कि  गलत के विरोध में सबको एक साथ खड़ा होना होगा, अलग -अलग विरोध करने से क्रांति नहीं लायी जा सकती, 
  वे स्वयं बहुत मितव्ययी थे तथा दूसरों को भी संयमित खर्च की सलाह देते थे! 
एक बार की घट्ना है जब डा० राममनोहर लोहिया को सोशलिस्टों ने बलिया में एक सभा को संबोधित करने हेतु बुलाया था! 
वह ऐसा दौर था जब डा०लोहिया का पूरे वर्ष का कार्यक्रम नियोजित रहता था आज यहाँ तो कल कहाँ , आवागमन का खर्च तथा भोजन व ठहराव का खर्च वहन  संगठन अथवा आयोजक को करना होता था! 
               डा०लोहिया बलिया समय से पहुँच गए तथा सभा को संबोधित करने के उपरांत उन्होंने अपने अगले कार्यक्रम के लिए पटना प्रस्थान की इच्छा जाहिर की, इस बाबत उन्हें ट्रेन पकड़ने बक्सर जाना था! 
डा० लोहिया जी को बक्सर पहुंचाने,अब छोटे लोहिया के नाम से ख्याति प्राप्त जनेश्वर मिश्रा जी, रामचन्द्र यादव जी, प्रो० रामनाथ सिंह जी, उस समय युवा तुर्क चन्द्रशेखर जी के चेले अम्बिका चौधरी जो बाद में समाजवादी सरकार में महत्वपूर्ण महकमों के कैबिनेट मंत्री रहे की जीप से जिसको खुद चौधरी जी चला रहे थे उसमें लोहिया जी को बैठाकर सभी लोग भरौली  पहुंचे! 
उन दिनों गंगा पर पुल नहीं थी सो नाव से नदी   पार करना था! 
सभी लोग नाव में सवार हो गए और उस पार पहुँच कर, डा० लोहिया को ट्रेन में बैठा दिए उसी समय पं० जनेश्वर मिश्रा जी के इशारे पर प्रो० रामनाथ सिंह जी ने पांच रूपए डा० लोहिया को देते हुए आशीर्वाद मांगा! 
तब लोहिया जी ने चौंकते हुए पूछा प्रोफेसर तुम्हारा विवाह हुआ है? 
प्रोफेसर साहब ने कहा जी, तब लोहिया जी ने कहा कि इतना पैसा मैं क्या करुंगा  , आप अपने बीबी बच्चों पर ये पैसे खर्च करो, मुझे केवल दो रुपए  दे दो ,बाकी आप वापस रखो मेरा खर्च ही कितना है ? आप लोगों ने टिकट करा दिया जिससे मैं पटना पहुँच जाऊंगा बीच में एक रुपए में कुछ नाश्ता कर लूंगा और ट्रेन से उतरने पर मेजबान वहाँ मिल जाएंगे और ठहरने तथा वहां से आगे जाने का प्रबंधन वे करेंगे ,हां एक रुपए  मैं सुरक्षित रखूंगा हो सकता है पार्टी वहां खर्च न दे पाए तो आगे जाने के काम आएगा ! हाँ अगर आप चाहो तो एक रुपए जनेश्वर को दे दो इसका खर्च बहुत है! 
 इतना बात सुनकर प्रोफेसर ने  लोहिया जी से पैसे रखने का आग्रह किया, तो कड़े शब्दों में उन्होंने कहा कि जो कह रहा हूँ वो सुनो ,तब प्रोफेसर साहब ने तीन रुपए वापस लिए.
ऐसे थे डा० लोहिया उनके समाजवाद का सपना अभी भी अधूरा है.... 
  

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