नवका साल के नामे चिट्ठी प्रिय नवका साल सादर प्रणाम का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...
सुच्चा बनारसी
कुछ दिन बनारस क्या रहे ,खुद को बनारसी समझने लगे,
जहां तहां आत्म विश्वास से लबरेज , घूमने टहलने लगे ,
मंदिर ,घाट हो सड़क हर जगह बनारसी होने का दम्भ भरने लगे ,
न वो सरदार रहे न सरदारी ,पर जहां खुला देखे लंगोटा कस दंड मारने लगे ,
प्रणाम -नमस्ते औ राम -राम तज, अभिवादन श्रेष्ठ महादेव कहने लगे ,
गंगा में डुबकी लगाकर हर हर गंगे कह दूर तक तरने लगे ,
लस्सी ,मलाई ,ठंडई ,मलईयो छके और मुंह में पान धरने लगे ,
बोली -आचार , व्यवहार और आहर में बनारसी वरण करने लगे ,
महाश्मशान की भभूत और माथे पर तिलक का श्रृंगार करने लगा ,
हमारा बनारस और खुद को घनीभूत बनारसी समझने लगे,
पर एक दिन संयोग हुआ घनघोर बनारसी से , जल ढारने में वाद करने लगा ,
मैं भी खुद को बनारसी बता आगे बढ़ने लगा ,
उसने बात की और बात - बात में बात पकड़ने लगा , मैं बनावटी बनारसीपने से अकड़ने लगा ,
उसने मेरी सारी अकड़ निकाल दी और महादेव पर पहला अपना अधिकार कहने लगा ,
मुझे ज्ञान मिलने लगा ,बनारस का होना और बनारसी दोनो अलग लगने लगा ,
वो गुरु निकला ,मेरा तो बस गुरुर था ,
तन से बलशाली और मन से स्थिर था ,
वो बनारसी अहीर था ||


हर-हर महादेव 🙏
ReplyDeleteबनारसी बनने का गुरूर ही कुछ और है
ReplyDeleteबनारसी पान और बनार्स
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