गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
!!उ कहाँ गइल!!
रारा रैया कहाँ गइल,
हउ देशी गैया कहाँ गइल,
चकवा - चकइया कहाँ गइल,
ओका - बोका कहाँ गइल,
उ तीन तड़ोका कहाँ गइल
चिक्का , खोखो कहाँ गइल,
हउ गुल्ली डण्डा कहाँ गइल,
उ नरकट- कण्डा कहाँ गइल,
गुच्ची- गच्चा कहाँ गइल,
छुपा - छुपाई कहाँ गइल,
मइया- माई कहाँ गइल,
धुधुका , गुल्लक कहाँ गइल,
मिलल, भेंटाइल कहाँ गइल,
कान्ह - भेड़इया कहाँ गइल,
ओल्हापाती कहाँ गइल,
घुघुआ माना कहाँ गइल,
उ चंदा मामा कहाँ गइल,
पटरी क चुमउवल कहाँ गइल,
दुधिया क बोलउल
कहाँ गइल,
गदहा चढ़वइया कहाँ गइल,
उ घोड़ कुदइया कहाँ गइल!!
Copy@viranjy
Sahi baat. Wo sab yaad ate hai.
ReplyDeleteयाद- याद बस याद रह जाती है, वह सांस्कृतिक विरासत, भौतिकता में हम सब कुछ भूल गए..
ReplyDeleteबचपन 55 मे भी नही भूलेगा ☺️
ReplyDeleteवाह
Deleteटेक्नोलॉजी आईल सबके ले के चल गईल।
ReplyDeleteसही कहला इस मुइ सब लिल ग इल
Deleteआइस पाईस कैसे आई,
ReplyDeleteक तिरि सत्ताईस कैसे आई...
Sahi सहिए बात बे ,सब भुला गइल
ReplyDeleteसुंदर रचना❤️
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ReplyDeleteन तो इसे साहस कहा जा सकता है और न ही बदतमीजी क्योंकि आप के सीखने की ललक आप को ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही थी ।
अब प्रश्र उठता है सर के दोहरी मानसिकता पर ,देर से आने पर किसी और के लिए "आ जाओ" और आप के लिए "गेट आऊट" । शायद घर से लड़कर आए थे ।
Shandar rachana
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