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नया वर्ष के नाम पत्र

 नवका साल के नामे चिट्ठी  प्रिय नवका साल  सादर प्रणाम      का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस   के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...

निजीकरण को जायज ठहराने का कुतर्क ....

निजीकरण सरकार की विवशता है अथवा निकम्मापन कुछ समझ में नहीं आ रहा है, रेल का निजीकरण, भेल का निजीकरण, तेल का निजीकरण, जेल का निजीकरण
जितने सार्वजनिक प्रतिष्ठान है सबका निजीकरण करती जा रही है सरकार समूचा संवैधानिक ढ़ाचा  सरकार की विवशता अथवा सनकीपने की भेंट चढता जा रहा है, जनता त्रस्त है .. 
अगर सार्वजनिक उपक्रम घाटे के सौदे है, तो पूंजीपति मुंह बाए खरीदने को क्यों तैयार है ं.. 
आइये कुछ प्रतिष्ठानों के सार्वजनिक से निजी होने के पार्श्व प्रभावों (side effects) के बारे में समझें
रेलवे-...आज तक हम पढ़ते आए हैं कि भारत का रेल प्रतिष्ठान सबसे समृद्ध प्रतिष्ठान है अगर सरकार ईमानदार हो तो सोने की रेलवे लाइन बिछाई जा सकती है, 
यात्रियों की बात करें तो उच्च वर्ग से लेकर मध्यमवर्गीय व निम्न वर्ग के लोग भी रेल में आसानी से सफर कर लेते हैं, 
परन्तु निजी रेल का में सुविधाएं पंचसितारा, परन्तु किराया हवाई सफर का इससे धनाढ्य वर्ग पर क्या फर्क पड़ता है, 
चिकित्सा--- सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं  इतनी सस्ती की कोई भी आसानी से प्राप्त कर ले और बढोत्तरी तथा असुविधा पर सरकार के विरोध का अधिकार था, 
परन्तु निजी चिकित्सा--
               निजी चिकित्सा में  व्यक्ति की जान बच तो जाती है, परन्तु और कुछ नहीं बचता धन -दौलत सम्पत्ति सबसे बेदखल हो जाना होता है! आज भी हम देखते ही है

सरकारी स्कूल-- सरकारी स्कूल में न्यूनतम सामाजिक स्तर के व्यक्ति का बालक भी सार्वभौमिक शिक्षा प्राप्त कर लेता है, 
और सरकार की जिम्मेदारी है, जो कि निहायत आवश्यक है! 
 निजी स्कूल--- सुविधाएं बेवजह और बेसुमार परन्तु निम्न स्तर का व्यक्ति अपने बच्चों को उसमें पढाने की हिमाकत नहीं कर सकता, 
शिक्षा का अधिकार प्राप्त होने के बाद निजी शिक्षण संस्थानों में पच्चीस फिसद  निम्न आय वर्ग के बच्चों का प्रवेश आज तक सुनिश्चित नहीं हो पाया.

अब बताइये क्या होगा भविष्य भारत का, क्या यही विश्व गुरु बनने की राह है, इन सभी सरकारी प्रतिष्ठानों की निलामी... 
खेत से उपज प्राप्त होती है तो उसका व्यापार लाभकारी होता है, परन्तु धीरे -धीरे होता और फिर खेत में उद्यम करना होता है.. फिर ऊपज का व्यापार चलता रहता है! 
 परन्तु जब खेत ही नीलाम कर दिया जाए तो अकूत धन वैभव प्राप्त होता है , परन्तु क्षणिक ही होता है, 
वही स्थिति है, निजीकरण की ..सरकारें संवैधानिक सरकारी प्रतिष्ठानों को नीलाम ठीक उसी तरह से कर रही हैं, जैसे कोई अपने पुरखों से प्राप्त भू सम्पदा को नीलाम कर, विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करता है ठीक उसी प्रकार से सरकार भी निलाम कर आनन्द उठाएगी और छोड़ जाएगी, बदहाली, बेकारी, बेगारी  , विश्व गुरु का सपना और रौद्र इतिहास कि अन्तिम सरकारी ट्रेन,  अन्तिम  सरकारी रेलवे स्टेशन, अन्तिम सरकारी एयरपोर्ट, अन्तिम सरकारी अस्पताल, अन्तिम सरकारी स्कूल और निजीकरण शुरू करने वाला ....... 

       


Comments

  1. मैं इस लेख से सहमत नहीं हूँ। इसमें लेखक का केवल पूर्वाग्रह जगलक रहा है। और यह तथ्यविहीन दिखाई पड़ता है।

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