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गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।  जरूरत है सियासत की ,  लोगों  को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।  तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है ,  असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं।  सजग रहना ऐ मूल निवासियों,  तुम्हारे बीच से  ,          विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार,  बे खौफ पसारे जा रहे हैं।  रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं।  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।     विरंजय १८/११/२०२५

ईश्वर पैठा दलीद्दर निकला

 लोक परम्पराओं का निर्वहन व विसंगति 



क्या हुआ होगा पहली दिवाली पर जब त्रैलोक्य विजेता मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पूरे जगत का दिल जीत कर अपनी अनुपम नगरी  अयोध्या पुनरागमन पर पलक बिछा कर  निर्निमेष दीपमाला प्रज्ज्वलित कर स्वागत किए होंगे |
राघवेंद्र सरकार ने अपने चरण धरा पर रखते ही आचरण का ऐसा दैदीप्यमान हस्ताक्षर किया कि आज भी समूचा जगत उस मर्यादा रद्दा पर रद्दा रखते हुए  आचरण व संस्कार का कंगूरा खड़ा कर स्वयं को संस्कारी संस्कृति का सदस्य बताता है |
     दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी और गणेश पूजनोत्सव के साथ  दीपमाला की श्रृंखलाएं मानव मात्र के जीवन जिजिविषा को प्रतिबिम्बित करते हैं |

ईश्वर पइस दलीद्दर निकला -

पूरे भारतवर्ष में संस्कृतियों और परम्पराओं की विविधता मनोहारी तथा चिंतन पर विवश करती है। 
         दरिद्र (दलीद्दर )बहिर्गमन की परम्परा उन्ही परम्पराओं का हिस्सा है ,देश के कोने - कोने में इस परम्परा के मानने - मनाने के तौर तरीके अलग हो सकते हैं परन्तु उसका उद्देश्य एक है , अपने घर से  दु:ख और दरिद्र का बहिर्गमन व शांति की अभीष्ट आकांक्षा होती है ,परन्तु  इस परम्परा के निर्वहन की रीति नीति जुदा है |
 देश के कुछ  हिस्सों में  दीपावली के दिन भोर में  पुरानी डाली ,सूप ,बेना ,दौरे और गत्ते अथवा डिब्बों को कजरौटा (बच्चों को काजल लगाने का पात्र) या धातु के प्रहार से  बजाते हुए   ,एक दीपक साथ में  लेकर  दरिद्र बहिर्गमन की प्रक्रिया आरम्भ होती है  ,यह करने वाली  महिला  अपने मुह एक पुनरावृति वाक्य दोहराती रहती है , "ईश्वर पैठस (पइस) दलीद्दर निकला " यह मंत्र मन को बल प्रदान करता और दु:ख -दरिद्र बाहर  ले जाकर  जलाते हैं और  उसकी लपट में स्वयं को सेंकते हैं ,लौटते हुए महिलाएं (लोक बोली में )कुछ समूह गीत गाती हैं |(तर्क दरिद्र बहिर्गमन कर लक्ष्मी का प्रवेश होगा)
            दुसरा--–-----देश के अधिकांश हिस्सों में उक्त  प्रक्रिया  दीपावली की सुबह होती  (तर्क व्यक्ति के बाहर करने दरिद्र बहिर्गमन नहीं होगा , भगवान अथवा लक्ष्मी के आगमन से दरिद्र बहिर्गमन होगा)


                           



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