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गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।  जरूरत है सियासत की ,  लोगों  को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।  तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है ,  असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं।  सजग रहना ऐ मूल निवासियों,  तुम्हारे बीच से  ,          विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार,  बे खौफ पसारे जा रहे हैं।  रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं।  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।     विरंजय १८/११/२०२५

ईश्वर पईठा दलीद्दर निकले

  ईश्वर पईठस दलीद्दर निकलस दीपावली की बिहाने . भोरे -भोरे दरिद्दर खेदल जाला सभे कजरवटा से डाली - दउरी पर एगो ताल की साथ ठोक -ठोक के कहल जाला , ईश्वर पइठस दलीद्दर निकलस .. पहिले पूरा टोला क मेहरारू आ मरद एक साथ निकल के आ दलिद्दर के एक जगह चौराहा पर फूंक -ताप के काजर पार के आ गीत गावत लौटस जा .. अब उ समय कहाँ बा अब त न डाली दौरी बा आ ना उ सनमत बा , अब लोग साड़ी के डिब्बा प छड़ बे बजावत जात बा आ जहां मन क ईलस होही जा फूंक ताप के चल आइल ... इ समाज कहाँ जात बा  ❓

सियासी दिये और सियासी बधाई

 दिये और सियासी बधाई  जल गये सब दिए भर गयी रोशनी  , अंधेरा बेचारा  स्वयं राह भूला  , झालरें सज रही हैं  , विदेशी धरा की , क्यों लाते हो घर में बेबसी का ये झूला , अगर दीप रखते कुम्हारी कला के ,  धरा स्वर्ग छूती ये मिट्टी जनम की , वो कोना भी सजता स्वदेशी धरा का,  दिखती वो खुशिया दिवारी , मिठाई , जरा तुम भी देखो व समझो निकट से , किसकी ये गलती है किसकी ढिठाई , आंखे तो जिनकी दिखती नहीं हैं,  भारत को उसने भी आंखें दिखाई , तज दो वो झालर , विदेशी सजाई , मुबारक उन्हें हो सियासी सगाई , सियासी पटाखे , सियासी खुशी , सियासी मिठाई , सियासी बधाई,  रखो घर की देहर पर  देशी दिये ये ,  जिसमें स्वदेशी महक हो समाई , भरो प्रेम घी से ये दीपक लबालब , बाती रखो स्नेह लिपटी दिया बीच , अंधेरे की हिय से अब कर दो विदाई , मुबारक हो सबको  आगमन राम का , दिवाली की सबको भर -भर के बधाई ||             सर्वाधिकार सुरक्षित                विरंजय (२०/१०/२०२५) भिलाई , छ०ग० 

हिन्दी दिवस पर उत्कृष्ट भाषण

 हिन्दी दिवस पर भाषण  आज हिन्दी दिवस है और  इस अवसर पर इस सभा में उपस्थित गुरुजनों को प्रणाम तथा सभी भाई -बहनों को यथोचित अभिवादन समर्पित करती हूं  |        हिन्दी दिवस पर मुझसे पूर्व  सभी वक्ताओं द्वारा कही गयी बातों से सहमति जताते हुए मैं  भाषण नहीं दूंगी बस अपनी बात कहूंगी |  मैं  यह समूचे राष्ट्र से यह पूछना चाहती हूं कि स्वतंत्रता के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारी मातृ भाषा हिन्दी को वो सम्मान क्यों न हासिल हो सका जो अन्य भाषाओं को प्राप्त है | क्या यह भाषण और वाद विवाद प्रतियोगिता महज एक आयोजन हैं ?  मैं  पापा के मोबाइल में एक वीडियो देख रही थी जिसमें मेरे जैसे एक बेटी अंग्रेजी  में  अन्य भाषाओं की अपेक्षा कम अंक प्राप्त कर पायी थी  | घर पहुंचने पर मां द्वारा पूछे जाने पर , कि बिटिया क्या हुआ  ,इतना उदास क्यों हो , आज तो परीक्षा का परिणाम आया है- आप को खुश होना चाहिए,  कहते हुए मां - बिटिया के हाथ से अंक पत्र ले कर देखने लगी और  पूछ बैठी बिटिया ये क्या  ? अंग्रेजी में इतने कम...

ईश्वर पैठा दलीद्दर निकला

 लोक परम्पराओं का निर्वहन व विसंगति  क्या हुआ होगा पहली दिवाली पर जब त्रैलोक्य विजेता मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पूरे जगत का दिल जीत कर अपनी अनुपम नगरी  अयोध्या पुनरागमन पर पलक बिछा कर  निर्निमेष दीपमाला प्रज्ज्वलित कर स्वागत किए होंगे | राघवेंद्र सरकार ने अपने चरण धरा पर रखते ही आचरण का ऐसा दैदीप्यमान हस्ताक्षर किया कि आज भी समूचा जगत उस मर्यादा रद्दा पर रद्दा रखते हुए  आचरण व संस्कार का कंगूरा खड़ा कर स्वयं को संस्कारी संस्कृति का सदस्य बताता है |      दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी और गणेश पूजनोत्सव के साथ  दीपमाला की श्रृंखलाएं मानव मात्र के जीवन जिजिविषा को प्रतिबिम्बित करते हैं | ईश्वर पइस दलीद्दर निकला - पूरे भारतवर्ष में संस्कृतियों और परम्पराओं की विविधता मनोहारी तथा चिंतन पर विवश करती है।           दरिद्र (दलीद्दर )बहिर्गमन की परम्परा उन्ही परम्पराओं का हिस्सा है ,देश के कोने - कोने में इस परम्परा के मानने - मनाने के तौर तरीके अलग हो सकते हैं परन्तु उसका उद्देश्य एक है , अपने घर से  दु:ख और दरिद्र का ...

उधार का नववर्ष उत्सव

उधार का नववर्ष उत्सव हम भारतीय लोगों की स्थिति एक चिड़िया "चोंचा " जैसी होकर रह गयी है | चोंचा के लिए कहानी है कि यह 🐦चिड़िया चतुर थी और अपने चाल से चल, उड़ और खा - पी कर अच्छे से जीवन यापन कर रही थी परन्तु एक दिन इसने देखा ,एक पक्षी हंस जो बहुत ही सुंदर चाल चल रहा था  | उसकी सुन्दर चाल देखकर इस चोंचा चिड़िया के मन में आया क्यों न मैं इस  पक्षी को अपना चाल प्रशिक्षक रख लूं और इसके जैसे चाल चलने लगूँ | इस आशय का प्रस्ताव लेकर चोंचा हंस के पास गया और अपनी जिज्ञासा सुना दिया, हंस ने चोंचा की पूरी बात सुनकर उसका चाल प्रशिक्षक बनना सहज ही स्वीकार कर लिया | प्रशिक्षण शुरू हुआ दिन बीतते गए परन्तु चोंचा हंस जैसा न चल सका अंत में चोंचा ने हार मानकर कहा के हंस मैं आप जैसा नहीं चल सकता मैं जैसा चलता था वैसा ही सही मैं वही चाल चलूँ तो ठीक यह कहकर दोनों विदा हुए | समय बीतता गया परन्तु चोंचा अपनी चाल भी भूल चुका था परिणाम यह निकला की चोंचा अब फुदक -फुदक कर चलता है!        हमारे कहने का आशय यह है कि हमारा देश स्वतंत्र तो हुआ परन्तु अंगरेजियत नहीं गयी, संविधा...