गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
उधार का नववर्ष उत्सव
हम भारतीय लोगों की स्थिति एक चिड़िया "चोंचा " जैसी होकर रह गयी है | चोंचा के लिए कहानी है कि यह 🐦चिड़िया चतुर थी और अपने चाल से चल, उड़ और खा - पी कर अच्छे से जीवन यापन कर रही थी परन्तु एक दिन इसने देखा ,एक पक्षी हंस जो बहुत ही सुंदर चाल चल रहा था | उसकी सुन्दर चाल देखकर इस चोंचा चिड़िया के मन में आया क्यों न मैं इस पक्षी को अपना चाल प्रशिक्षक रख लूं और इसके जैसे चाल चलने लगूँ |
इस आशय का प्रस्ताव लेकर चोंचा हंस के पास गया और अपनी जिज्ञासा सुना दिया, हंस ने चोंचा की पूरी बात सुनकर उसका चाल प्रशिक्षक बनना सहज ही स्वीकार कर लिया | प्रशिक्षण शुरू हुआ दिन बीतते गए परन्तु चोंचा हंस जैसा न चल सका अंत में चोंचा ने हार मानकर कहा के हंस मैं आप जैसा नहीं चल सकता मैं जैसा चलता था वैसा ही सही मैं वही चाल चलूँ तो ठीक यह कहकर दोनों विदा हुए | समय बीतता गया परन्तु चोंचा अपनी चाल भी भूल चुका था परिणाम यह निकला की चोंचा अब फुदक -फुदक कर चलता है!
हमारे कहने का आशय यह है कि हमारा देश स्वतंत्र तो हुआ परन्तु अंगरेजियत नहीं गयी, संविधान का निर्माण हुआ परन्तु पूरा संविधान बहुराष्ट्रीय नियमावली की पोथी बनकर रह गया |
इसमें फला अनुच्छेद फला देश के संविधान से नकल किया गया तो फला क्लाज फला देश से और सम्पूर्ण संविधान में प्रस्तावना अपनी और जिल्दसाजी अपनी है |
ठीक उसी तरह से नव वर्ष की बात आती है तो समझ में नहीं आता की कब नया वर्ष मनाऊं जनवरी को या चैत्र मास प्रतिपदा को | मेरे मित्र , सगे संबन्धी सभी लोग स्कूल समय से व्यवसायिक जीवन तक में जनवरी में हैप्पी न्यू इयर, नव वर्ष मंगलमय हो, इत्यादि के वाक्य बोलते प्रत्युत्तर में सेम टू यू अथवा आप को भी अंगरेजी कैलेंडर का नववर्ष मंगलमय हो का वाक्य मैं कहता परन्तु अब लगता है कि मैं अंगरेजी कैलेंडर का नया साल कहकर अपनी राष्ट्र की ग्राह्यता को तिरस्कृत करता हूँ , जब हमारा राष्ट्र उस कैलेंडर को स्वीकार कर चुका है तो मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं है | हमारी इस दुविधा का कारण हमारी पृष्ठभूमि गाँव के होने से है | हमारे त्यौहार, हमारे संस्कार, हमारी कृषि, हमारे उत्सव कर्म सभी पंचांग संवत से होने है ं बाकी जो गाँव से निर्मूल हो गये उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता | हमारी मां फसल की बुआई से लेकर गोइठा (उपला)रखने, व्रत, कथा- वार्ता सब इसी संवत् पंचांग से ही करती हैं | अब ऐसे में दुविधा तो लाजमी है |
अब देखना यह है कि जब सभी लोग एक से तीस -एकतीस , संडे से सटरडे, जनवरी से दिसम्बर व्यवहार में ला रहे हैं तो इसे अंगरेजी कैलेंडर कहना मेरा अथवा किसी के लिए भी धृष्टता या कृतघ्नता ही होगी |अब प्रश्न यह है कि कितने लोग कार्तिक से फाल्गुन, पूर्णिमा से अमावस्या तक की तिथियों को जानते और व्यवहार में लाते हैं संख्या नगण्य होगी | तो जब यही कैलेंडर व्यवहार में है , शासन- प्रशासन व जनमानस को ग्राह्य है तो इसकी अवहेलना नहीं होनी चाहिए | और यदि इसकी अवहेलना नहीं करते तो बडा़ दिन 25 दिसम्बर भी मनाओ!
कुछ राजनीति के छद्म राष्ट्रवादी जो बात- बात को धर्म सम्प्रदाय से जोड़ते हैं और उन छद्म राष्ट्रवादीयों के वैचारिक आतंकवाद के शिकार कुछ कुपढ लोग जो पल -पल अपने बीच रह रहे लोगों से गुलाम होने का भय उन्हें सताता रहता है जबकि उन्हें पता नहीं है कि वे मानसिक गुलामी झेल रहे हैं जो खतरा है ही नहीं उसी भय में वैचारिक मंद जहर का सेवन कर रहे हैं और उनके वैचारिक आतंकी गुरु उसका लाभ लेकर मजे कर रहे हैं |
अन्ततोगत्वा यह सर्वसिद्धि है कि संविधान से लेकर भौतिक संसाधन रेल -सड़कें, कैलेंडर, भाषा सब उधार के है ं अब क्रीतदास (खरीदे गए गुलाम) बने रहिये और अधिक चिन्तन न करें अनुकरण करिये अन्यथा पागल कहे जाएंगे ||
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