*काशी से स्वर्ग द्वार- बनवासी तक*(भाग-२)

अगले दिन सूर्योदय कब हुआ इससे अनभिज्ञ रहे,लगभग आठ बजे हम लोगों को निंद्रा ने मुक्त किया। अब हम लोग उत्साह और ऊर्जा से लबालब थे।मैंने बालकनी से झांक कर देखा सूरज प्रकृति को परिभाषित करने में तथा करने में जुटा था। मैं यह नयनाभिराम दृश्य कुछ देर तक निहारता रहा तभी मेजबान महोदय की आवाज - अरे कहां हैं आप लोग ! इतना सुनते ही मैं अन्दर मुखातिब होते हुए, हां-हां यहीं ,सदेह हैं सभी लोग । एकबार सभी लोग हंस पड़े। उन्होंने ने कहा दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर काफी/चाय कर लीजिएगा , बोल दिया हूं ,मेस वाला लाकर पहुंचा जाएगा और कहां जाने का विचार है आज! हम लोगों को वहां के नामचीन पर्यटन स्थानों की सूची सुपुर्द करते हुए उन्होंने कहा। हमारे सहयात्रियों ने उन नामों में से एक गम्भीर नाम तीरथगढ़ का चुना । अब हम लोग चाय नाश्ता से तृप्त होकर चार की संख्या में दो सवारियों एक पहले की बाइक तथा एक यामाहा एफ जेड से निकल पड़े अपनी प्रवृति प्रेरित जिज्ञासाओं का शमन करने।सुहानी हवा , चिकनी सड़कें ,विरल आबादी से परिचय करते अब हम लोगों का कारवां *बस्तर* के जिला मुख्यालय *जगदलपुर* शहर से होते हुए अविराम लगभग चालीस किलोमीटर *केशलूर* पहुंच चुका था। केशलूर से हम लोगों का गन्तव्य स्थान *तीरथगढ़* लगभग बीस किलोमीटर पर अवस्थित था। अब हम लोगों की अकुलाहट और बढती जा रही थी, आबादी लगभग शून्य हो चली थी एकाध झोपड़ियां और आवास दिखाई पड़ जाते थे, केवल ऊंचे-ऊंचे जंगली वृक्ष दूर तक सन्नाटा एक्का -दूक्का वाहन और हमारे वाहन के इन्जिनों की चीत्कार सन्नाटा को भंग कर रहे थे।
हम लोग अब एक बैरियर पर पहुंचे जहां वनविभाग द्वारा बेनामी कर संग्रह किया गया हम लोगों ने बिना किसी पूछ-ताछ अपेक्षित धन जमा कर आगे बढ़े और *कांगेर घाटी* को निरखते हुए क्रमश: जलप्रपात की कल-कल, हर-हर ध्वनि की तीव्रता के तरफ बढ़े जा रहे थे की ध्यान अचानक किनारे के तरफ पानी के बोतलों में भरे सफेद द्रव की बिक्री कर रही महिलाओं के तरफ गया।हम अपनी प्रवृति से विवश होकर वाहन से उतर उनके पास जाकर पूछ बैठे परन्तु भाषा विविधता के कारण कुछ स्पष्ट न हो सका । यद्यपि यह समझ में आया कि यह कुछ पेय पदार्थ है जिसे ये लोग पंद्रह-बीस रुपए प्रति बोतल बेच रही थी।बाद में अन्य लोगों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि वह किसी पेड़ से प्राप्त रस था । कुछ दूर आगे बढ़ने पर महिलाएं बैरियर लगाकर रास्ता रोके खड़ी थी जो गांव की चुंगी एकत्र कर रही थी उनका भी भुगतान कर अब हम लोग *तीरथगढ़ जलप्रपात* के निकट अपने वाहन बगैर किसी संरक्षा -औपचारिकता पूरी किए खड़े कर जल्दी से जलप्रपात की तरफ बढ़े।
वहां पहुंचकर👀 आंखों ने अप्रतीम नजारा देखा लगभग तीन सौ फीट ऊपर से पानी तड़-तड़ ,फड़-फड़ पत्थरों का चुम्बन कर छिटकता और पुनः चूमता पर पत्थरों के नियंत्रण से परे , स्व-नियंत्रण शून्य, दूध सा श्वेत , चांदनी सा धवल मानो स्वर्ग से मां गंगा का अवतरण हो रहा हो और हम सब बिन तपस्या के भगीरथ बने हर्षाए देख कर मुदित हुए जा रहे हों।
हम लोगों ने स्मृति स्वरुप कुछ तस्वीरें तथा खुदखेंचु कैद किए और वस्त्र तथा बैग एक जगह अपने एक सहयात्री के संरक्षण में रख कर हम तीनों स्वयं को जल अवतरण से रोक न सके लगभग एक घण्टे तक ऊपर के गिरते जल से मुकाबला तथा जल का धक्का देकर दूर करना और पुनः हम लोगों का हठ पूर्वक पहुंचना चलता रहा समय कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला ।उसमें अन्य पर्यटक भी जलक्रिड़ा का लुत्फ उठा रहे थे। सब सुरक्षित था ध्यान रखना था पैर न फिसले नहीं तो असंरचित पत्थरों से भीषड़ आघात की आशंका थी।

अब हम लोग बाहर निकले समय देखने पर लगा कि अब देर हो गई है जल्दी वापस चलना चाहिए।
इसी आपाधापी में तीरथगढ़ की *कुटुमसर* गुफा न पहुंचने का मलाल अब भी है।
लौटते समय जगदलपुर में एक ढाबे पर जलपान ग्रहण किया गया जिसका अनुभव सही नहीं रहा।
फिर जगदलपुर उड़ान रहित एयरपोर्ट से होते हुए एन एम डी सी के निर्माणाधीन लौह इस्पात संयंत्र नगरनार पहुंचे जहां काफी हाउस में काफी का जायका लेते हुए अपने विश्राम गृह पहुंच गए।
आगे की यात्रा...... *स्वर्ग द्वार बनवासी* *शेष* .........
यात्रा वृत्तांत मनोरम
ReplyDeleteयदि यात्रा रोचक हो तो कमेंट अवश्य करें..
ReplyDeleteWah
ReplyDelete👌🏻👌🏻
ReplyDeleteजी हां बहुत बढ़िया
Deleteयात्रा में रोचकता अन्त तक बनी है तथा एडवेंचर भी है
ReplyDeleteये स्वर्ग द्वार क्या है
ReplyDeleteहम लोगों को भी ले चलिए
ReplyDeleteअद्भुत लेखन शैली।
ReplyDeleteAchha hai
ReplyDelete