गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
#उसके उन्नयन से प्रस्थान तक #
अब रितेश की शिकायतें धक्का - मुक्की तक तथा छीना - छपटी तक ही सीमित रह गईं थीं, परन्तु अभी भी पूरे विद्यालय में किसी की पेन, पेंसिल अथवा कापी - किताब भूल जाती तो रितेश के बस्ते के निरीक्षण की अपील जोर पकड़ लेती और यह जानते हुए भी की उसके पास अमुक वस्तु नहीं है उसकी तलाशी लेनी होती और उसके पास वह सामान नहीं मिलता लेकिन पूर्व की आदत से वह बदनाम था !
तबतक संस्था के प्रधानाध्यापक भी आ चुके थे और उनका भरपूर सहयोग प्राप्त हो रहा था! प्रधानाध्यापक महोदय के साथ अब पूरे स्टाफ के लोगों को रितेश में सब बच्चों के समान प्रतिभा दिखने लगी थी!
अब धीरे - धीरे रितेश अपने कक्षा के स्तर व पाठ्यक्रम की सभी समस्याओं को हल कर लेता और हिन्दी के साथ अंग्रेजी भी सही से पढ़ लेता, परन्तु कला में अब भी वह रुचि नहीं ले रहा था , लेकिन लिखावट में अपेक्षित सुधार हो गया था! वह खेल में तथा वाह्य क्रियाओं में चढ -बढ कर हिस्सा लेता परन्तु शारीरिक क्षमता अनुरूप पिछड़ जाता परन्तु हारता नहीं!
खाना खाते समय उदण्डता अवश्य करता, यह सब करते - धरते रितेश कक्षा पांच में बढ़ गया! अब रितेश को सभी राज्य -राजधानी बीस तक पहाड़ा तथा अपने पाठ्यक्रम व स्तर का सब कुछ उसे याद था !
जो सबको खुश करता था, परन्तु शरारत अभी भी कर बैठता था.... इस तरह अब रितेश सारी खूबियों के साथ कक्षा पांच उत्तीर्ण हुआ और हमें आत्मिक संतोष.....अब वह अगले स्कूल और हम ..............अगले डमरू के साथ मशगूल.पढने के लिए यहाँ क्लिक करें- मेरे प्रयोग "डमरू" से सामना
THE END
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