ससुराल की बखान एक ब्याहता बेटी जब अपने पीहर लौटती है , तो सभी भेंटहारन धीरे -धीरे अपने घर को चली जाती हैं, मां पास में बैठी होती है और पूछती है, बोल बिटिया ससुराल में सब केईसन बा... तो बिटिया अपनी माँ की जिज्ञासा का शमन गेय भोजपुरी संवाद में करती है....(यह संवाद उस समय का है जब मां और बिटिया के पास फोन नहीं था ) “अपनै अपन करीं केतनी बखान हो, सासु मोरी धरती, ससुर असमान हो। “जेठउत त हमरे ससुर के दुलरुआ, गंगा अस निरमल हमरी जेठान हो।” “लहुरा देवरूआ हमरी अँखिया के पुतरी, सासु जी के अँचरा के कोनवां परान हो।” “ननदी हमार पुनवासी के अँजोरिया, सईंया मोर उगें जइसे सुरुज बिहान हो।” “नइहर मोरा जइसे जल भर बदरा, मोरे ससुरे वइसे लहरै सीवान हो।” प्रथम पंक्ति में लड़की कहती है कि मैं अपने से अपना वर्ण कैसे करूं ... और आगे कहती है की मेरी सासू माँ तो इतनी धैर्यवान है , जितना धरती , पृथ्वी इतना विशाल ह्रदय और धैर्य वाली हैं, मेरी सासू माँ | ससुर जी का वर्णन करते हुए कहती है कि मेरे ससुर जी तो आकाश की तरह विशाल...
ससुराल की बखान
एक ब्याहता बेटी जब अपने पीहर लौटती है , तो सभी भेंटहारन धीरे -धीरे अपने घर को चली जाती हैं, मां पास में बैठी होती है और पूछती है, बोल बिटिया ससुराल में सब केईसन बा...
तो बिटिया अपनी माँ की जिज्ञासा का शमन गेय भोजपुरी संवाद में करती है....(यह संवाद उस समय का है जब मां और बिटिया के पास फोन नहीं था )
“अपनै अपन करीं केतनी बखान हो,
सासु मोरी धरती, ससुर असमान हो।
“जेठउत त हमरे ससुर के दुलरुआ,
गंगा अस निरमल हमरी जेठान हो।”
“लहुरा देवरूआ हमरी अँखिया के पुतरी,
सासु जी के अँचरा के कोनवां परान हो।”
“ननदी हमार पुनवासी के अँजोरिया,
सईंया मोर उगें जइसे सुरुज बिहान हो।”
“नइहर मोरा जइसे जल भर बदरा,
मोरे ससुरे वइसे लहरै सीवान हो।”
प्रथम पंक्ति में लड़की कहती है कि मैं अपने से अपना वर्ण कैसे करूं ... और आगे कहती है की मेरी सासू माँ तो इतनी धैर्यवान है , जितना धरती , पृथ्वी इतना विशाल ह्रदय और धैर्य वाली हैं, मेरी सासू माँ |
ससुर जी का वर्णन करते हुए कहती है कि मेरे ससुर जी तो आकाश की तरह विशाल ह्रदय वाले हैं , पूरे परिवार को समाहित करके रखते हैं |
दूसरी पंक्ति में अपने पति के बड़े भाई का जिक्र करते हुए कहती है कि हमारे भसुर (ज्येष्ठ ) इतने सरल स्वभाव वाले और कर्मठी हैं कि ससुर जी उन्हें बेहद प्यार करते हैं तथा ज्येष्ठ की पत्नी अर्थात मेरी जेठान भी गंगा के पवित्र जल जैसे पवित्र और कोमल स्वभाव वाली हैं |
तीसरी पंक्ति में ससुराल के सबसे मधुर सम्बन्धों का खयाल रखते हुए बताती है कि छोटा देवर भी हमें बेहद प्रिय और प्यारा है , ठीक वैसे ही जैसे आंख में पुतली रहती है , और इतना ही नहीं छोटा देवर सास के आंचल में बंधे उनके प्राण की तरह है।
चौथी पंक्ति से ससुराल की उस डोर को बांधती है जिससे खुद बंधी हुई है और कहती है, मां मेरी ननद अर्थात पति की बहन ठीक वैसी ही प्यारी , निर्मल और सुखदाई है जैसे पूर्णिमा की रात होती है ,
सबसे बाद में पति का जिक्र करते हुए सुनाती है कि पति तो हमारे उगते सूर्य की तरह पूजनीय हैं , उनके आने से घर , आंगन , चारो दिशाएं खिल उठती हैं जैसे अभी -अभी सबेरा हुआ हो |
अंतिम पंक्ति में बेटी अपनी माँ की तरफ मुखातिब होते हुए कहती है , मां मेरा मायका /पीहर \ नईहर जिस प्रकार से भरे बादलों की तरह सुख -समृद्धि व वैभव से सबको तृप्त करने वाला है , ठीक उसी प्रकार से मेरी ससुराल भी उतना ही सम्पन्न और समृद्ध है जैसे फसलों से भरा उफनता सिवान (दूर तक फैले खेत) |
ये ससुराल , ब्याहता बेटी और उसकी माँ के संवाद थे , इससे वर्तमान की तुलना न करें, अब तो डोली चढ़ने से पहले ससुराल की पोल पट्टी , जासूसी और मुखबिरी करती हैं लड़कियां फिर सबके हिसाब से पैंतरे , सबके साथ फोन और फोन पर मां -बहन से घण्टों कोचिंग |
ससुराल भी उस क्रिया पर प्रतिक्रिया देने हेतु तैयार, तो सम्बन्ध वैसे होना तो सम्भव नहीं

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