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गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।  जरूरत है सियासत की ,  लोगों  को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।  तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है ,  असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं।  सजग रहना ऐ मूल निवासियों,  तुम्हारे बीच से  ,          विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार,  बे खौफ पसारे जा रहे हैं।  रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं।  अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं,   पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं।     विरंजय १८/११/२०२५

मुखिया बनेंगे

मुखिया बनेंगे ? 

           .... तो याद रखिये |


प्रखर समाजवादी विचारक डा० राममनोहर लोहिया ने कहा था " जिन्दा कौमें पांच साल इन्तजार नहीं करती "
जब से मैं जानने के योग्य हुआ गाँव से लेकर ब्लॉक, जनपद और प्रदेश तथा देश की राजनीति को लहरते  , घहरते  देखा हूँ,  चुनाव आते ही गाँव में चुनावी विशेषज्ञों की चांदी हो जाती है हर व्यक्ति अपने स्तर का प्रकाण्ड चुनावी समीक्षक होता है ,भले उसकी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक स्थिति कुछ भी हो एकाध घंटे में एक प्रत्याशी को जिताने और हराने की मौखिक कुशलता  बखूबी रखता है! सामाजिक खोरहों (ईर्ष्यालुओं) के भी कौशल प्रदर्शन की गहन परीक्षा होती है  ये योग्य उम्मीदवार को नीचा और बहुआयामी अयोग्य को उत्कृष्ट बताने की कला से समृद्ध होते हैं, इनके हनी ट्रेप  में पढे - लिखे मूढ़ बखूबी फंस जाते हैं!
अब बारी आती है आधारहीन पुरानी अदावत के प्रतिशोध की उम्मीदवार के कथित विरोधी निन्दा रस के रसिक याद दिलाते हैं 'वोट देवता को - अरे आप फलां को वोट देंगे.. फलां को... भूल गए क्या❓ इसी के दादा ने आपके दादा के बंजर बाग से आंछी का पेड़ काटा था उसकी एक जुआठ (जुआं - बैलों के कंधे पर रखी जाने वाली लकड़ी) बनवाया, इसे तो आप हर्गिज वोट मत दीजिएगा! 
    और वोट देवता को बात समझ आ जाती है, अब वो भला उसे वोट कैसे दे सकते हैं! 
    अब बात आती है वर्तमान, भूत अथवा भविष्य में उम्मीदवार बनने की दमित इच्छा लिए जीवित जीवधारियों की जो फलां के उम्मीदवार होने से कट - कट के रह जा रहे हैं वे  सशरीर तो साथ हैं परन्तु आत्मा भटक रही है  अवसर को भुनाने से नहीं चूकते!! 
     एक श्रेणी ऐसी भी है जो  सशरीर साथ आने में तो उसका वश नहीं चलता परन्तु आत्मिक रुप से साथ रहकर मजबूत करते हैं, इन्हें साइलेंट वोटर कहते हैं जो उत्तम श्रेणी के माने जाते हैं!! 

                

  अब बात आती है कत्ल की रात स्त्रातजी की यह मतदान से एक दिन पूर्व की रात होती है इस दिन अफवाह, दलील और दलाली से बचे वोट देवता हवा की प्रतीक्षा में रहते हैं कि जिधर की हवा हो चढ़ जाओ  इस उतार - चढ़ाव और धींगा - मुस्ती  के साथ  उम्मीदवारों की तकदीर मतपेटी में बन्द हो जाती है  ! 
फिर गाँव की गली, चट्टी , चौकी और चौपाल  चर्चाओं से गरम होती है  , सब अपने - अपने तरीके से अपने उम्मीदवार को जीताते  हैं तर्क और कुतर्क देते हैं   ! धीरे - धीरे वह दिन भी आ जाता है मतगणना होती है एक व्यक्ति जीतता है बाकी कुछ मतों से छूट जाते हैं, एक तरफ खुशहाली होती है फूल - माला मिठाई, जिन्दाबाद, आशीर्वाद का सिलसिला चल पड़ता है! दूसरे तरफ उदासी, मातम, खर्च और वोटों की समीक्षा होती है! गाँव में नये सिरे से गोल- गोलबंदी, भवदीय बन बिगड़ जाती है, पांच बरस के लिए सामाजिक संरचना तैयार होती है! फिर खोरहा अपने काम में निन्दक अपने व्यवसाय में प्रधान जी कहीं गांठ जोड़ने, कहीं गांठ छोड़ने सामाजिक संतुलन बनाने में व्यस्त.सब अगले पाँच वर्ष के लिए....
            लेखक - विरंजय

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