नवका साल के नामे चिट्ठी प्रिय नवका साल सादर प्रणाम का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...
किसान बड़ा या सरकार अड़ी
सरकार के तरफ से मिडिया में दुष्प्रचार किया जा रहा है कि किसान अड़े है ं , जबकि सही से विश्लेषण किया जाए तो सरकार अड़ियल रवैया अपना रही है, तीन अव्यवहारिक कानून लाते समय सरकार ने खूब ढोल पीटा की किसानों को तोहफा दिया जा रहा है! अब पूरे देश का किसान इस अनचाहे तोहफे को लेने से इनकार कर रहा है, तो सरकार जिद्द पर है कि हम संशोधन करेंगे वापस नहीं लेंगे ! यह जिद्द सरकार का अहंकार दर्शाती है , जो तोहफा किसान लेने से मुकर रहे हैं उसे सरकार बरबस देने को जिद्द पर है! सरकार अब दूसरा रास्ता अपना सकती है,
जैसे - किसान आंदोलनकारियों को आतंकवादी बताना,
उन किसानों का कपड़ा, खाना और वाहन निहारना सरकार की मानसिकता दर्शाता है, आज भी सरकार में बैठे लोग जो स्मार्ट सिटी और विकसित भारत के सपने देखते हैं उनसे ये उम्मीद नहीं की जा सकती की वे गाँव और किसान को बदहाल, फटेहाल, नंगा और भूखा देखना चाहता हो.. उसे उनका खाना, कपड़ा बर्दाश्त नहीं है!
सरकार इस योजना में है कि किसानों का आन्दोलन लम्बा खींचे और किसान आन्दोलन दम तोड़ दे !
अथवा मीडिया और अपने झूठे आईटी सेल तथा माउथ मीडिया से यह अफवाह फैलाने में सफल होना चाहते हैं कि किसान आन्दोलन नाजायज है !
किसान आन्दोलन में अपने चण्डाल -चौकड़ी भेजकर दंगे कराकर भी आन्दोलन को कमजोर करने का प्रयास कर सकते हैं ! जो की सत्ताधारी पार्टी की फितरत है, अभी किसानों के आन्दोलन को प्रशासन के बल से रोकने का प्रयास किया जा रहा....
देखिए यह आन्दोलन कहाँ तक जाता है...
सरकार छटपटाहट में है ,जो कोरोना के आड़ में किसानों को पूंजीपतियों के यहाँ बन्धक रखना चाहती है, और किसान अपना हित- अहित पहचान गयी है !
किसान की आय की जगह दुख दोगुना हो गया !
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