गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। जरूरत है सियासत की , लोगों को प्रशिक्षित कर , गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। तुम्हारी कौम क्या है , गोत्र क्या है , असलीयत क्या है , बे -वजह उचारे जा रहे हैं। सजग रहना ऐ मूल निवासियों, तुम्हारे बीच से , विभीषण निकाले जा रहे हैं। विविधता में एकता से , हलकान है सियासत , गुच्छे में बंधे विचार, बे खौफ पसारे जा रहे हैं। रंज , रंजिश , रंजय निरखकर , कलम से कर्ज उतारे जा रहे हैं। अब तो कागज , खंगाले जा रहे हैं, पोथियों में दफ्न पुरखे निकाले जा रहे हैं। विरंजय १८/११/२०२५
प्रशिक्षण का सफल प्रयोग (डमरू)
मैंने प्रशिक्षण के दिनों में प्रशिक्षण गम्भीरता से लिया जिसमें गुरुजनों और सहपाठियों का विशेष योगदान रहा, अब बारी थी, अपने प्रशिक्षण के प्रयोग की, मेरी योग्यता व अर्हता अनुरूप मुझे प्रयोगशाला अथवा कर्मभूमि कहूँ मुझे प्राप्त हुई, जो मेरी जन्म भूमि से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर थी!
वह एक सरकारी प्राइमरी स्कूल था! कर्तव्य का निर्वाह अथवा प्रयोग एक निर्धारित मानक व नियमों के अन्तर्गत ही करना था ! हमारी संस्था प्रमुख एक व्यवसायिक व व्यवहार कुशल महिला थी , जिनसे कर्तव्य निर्वहन की व्यवहारिक कुशलता को बढ़ाने का सफल सहयोग मिला , कुछ दिन के हम लोगों के मार्गदर्शन के उपरांत उनका स्थानांतरण दूसरे विद्यालय में हो गया !
उस समय हम सभी लोगों को मिलाकर पांच का स्टाफ था, दो महिला दो पुरुष और एक प्रधानाध्यापिका महोदया!
कुछ सामान्य सी औपचारिकताओं के साथ
मैंने अपना सीखने- सीखाने का कार्य प्रारंभ कर दिया था!
सभी लोग अपने -अपने तरीके से कर्तव्य निर्वहन में कुशलता पूर्वक व्यस्त थे, तभी मेरा ध्यान एक ऐसे बालक के तरफ गया जो अपने प्रतिकूल व्यवहार के कारण मेरा ध्यान बरबस खींच रहा था!
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