नवका साल के नामे चिट्ठी प्रिय नवका साल सादर प्रणाम का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...
कुदरत ने हमें यह जीवन उपहार स्वरूप प्रदान किया है, हमें क्या हक है इसे यूँ ही नष्ट करने का ?
क्या हमने उस जीवन देने वाले के बारे में तनिक भी सोचा?
आंकड़े बताते हैं कि इसकी चपेट में 20 से 29वर्ष सतक के युवा हैं!
आखिर क्यों ऐसा करते हैं लोग आइये जानते हैं,
आत्महत्या के सामान्यतः दो ही कारण हो सकते हैं-
पहला -क्षणिक अवसाद
दूसरा- लम्बा अवसाद
क्षणिक अवसाद में व्यक्ति छोटी- छोटी समस्याओं से सामना करने का साहस नहीं कर पाता और यह कदम उठा लेता है,
इसका जिम्मेदार है, एकाकीपन की बेहूदा होड़..
बेतहाशा स्वप्न इत्यादि..
कभी- कभी लम्बे अवसाद से भी ग्रसित होकर लोग यह कदम उठाते हैं, जो बिलकुल ही नाजायज है,
यह जीवन प्रकृति क्षमा अनमोल उपहार है, इसे सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवित रखिए, चुनौतियों का सामना डट कर करें अपने मिज़ाज और सकारात्मक सोच के लोगों से दोस्ती रखिए, अपने आप को व्यस्त रखिए मस्त रहिये...
कविराज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज की कुछ पंक्तियां है:
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है मोती व्यर्थ बहाने वालो !
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है? नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो।
डूबे बिना नहाने वालो !
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गयी तो क्या है
ख़ुद ही हल हो गई समस्या,
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या,
रूठे दिवस मनाने वालो !
फटी कमीज़ सिलाने वालो !
कुछ दीपों के बुझ जाने से आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी ।
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालो !
चाल बदलकर जाने वालो !
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
लाखों बार गगरियाँ फूटीं
शिकन न आई पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं
चहल-पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालो
लौ की आयु घटाने वालो
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफ़रत गले लगाने वालो !
सब पर धूल उड़ाने वालो !
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है।
- गोपालदास नीरज
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