नवका साल के नामे चिट्ठी प्रिय नवका साल सादर प्रणाम का हो साल तू केतना जल्दी बीत गईला कुछ समझ में ना आइल लोग कहत रहलन की साल दर साल उमर बढ़त गईल लेकिन , हम त कहत बानी की उमर बढ़ल त ना घट गईल , बाकि प्रकृति क नियम ह की क्षतिपूर्ति जरुर करे ले उमर त घटल बाकि अनुभव बढ़ गईल | लोगन के चेहरा पढ़े क हुनर भी मिलल , कुछ लोग कहलन की तू बदल गईला हमके त न बुझाइल की हम बदल गइनी लेकीन ह , इ जरुर कहब की समय की बदलत नब्ज़ के हम ना नकार पवनी आ , दायित्व निभावे में हम एइसन अंझुरा गइनी की बदलाव समझे ही ना पवनी आ धीरे -धीरे बाल आ खाल के रंग भी बदले लागल | लेकिन ,समय अइसन मुट्ठी से सरकल की कुछ समझे ना आइल | लोग सबेरे से कहे शुरु कइलन की हैप्पी न्यू ईयर , अब हम उनके का बताईं की हैप्पी त लोग तब होखेला जब अपना साथ कुछ बढ़िया होखे ला , हम का बताई खाली भर , बरिस के पीछे क अंक बदले पर एतना हल्ला मचत बा - की का बताईं , इ खाली बाजार आ टीबी अउर व्हाट्स अप्प विश्व विद्यालय क फइलावल रायता ह , सरकार के भी फायदा बा -लोग कई अरब के त मदिरा पी जात बा...
महाड सत्याग्रह के लगभग सौ साल और दलित विमर्श
दलित उसे कहा गया जो दबाया गया हो, जिसे आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षिक अधिकारों से जिन्हें वंचित किया गया हो वो हैं दलित |
महाड सत्याग्रह को अभी सौ साल भी नहीं हुए और दलित दिगभ्रमित हो गया | भूल गया अपने पर हुए अत्याचार को , जब रास्ते तालाब और पनघट उसके लिए नहीं थे | एकाधिकार था उसपर अभिजात्य वर्ग का |
अछूतों से रास्ते दूषित हो जाया करते थे | जलाशयों से हिन्दू- मुस्लिम, सिक्ख व कुत्ते और जानवर तो पानी पी सकते थे परन्तु दलित ( कथित अछूत जो हिन्दू में ही गिने जाते थे ) पानी नहीं पी सकते थे | प्रकृति प्रदत्त इन संसाधनों पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार था |गलती से अगर कोई कथित अछूत इन जलस्रोतों के जल का स्पर्श कर लिया तो गाय के मूत्र, गोबर व गंगाजल प्रवाहित कर जलाशय को पवित्र किया जाता था |
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में चावदार तालाब से 20 मार्च 1927 को अपनी अंजुरी में जलभर कर पीया और वहीं पर अर्धनग्न, नग्न, दबे -कुचले समाज को सम्बोधित किया तथा उनके अधिकार के प्रति जागरूक किया इस सत्याग्रह को महाड सत्याग्रह, चवदार मुक्ति सत्याग्रह और सामाजिक सशक्तिकरण दिवस का नाम दिया गया |
स्थिति आज भी कमोबेश बनी हुई है, शिक्षा, चिकित्सा और सम्बोधन के दोहरे मापदंड अछूत बनाए रखते एक बड़े वर्ग को और इन संसाधनों पर आज भी एक विशेष वर्ग काबिज है |
बाबा साहेब ने एक शम्मा जलाई वह खूब प्रकाश की परन्तु उनके सपने को बेच रहे हैं लोग... आने वाली पीढ़ी को दलित और अछूत बनाने के तरफ बढ़ रहे हैं लोग... आप भी सोचिए की आप किस प्रकार सम्मिलित हैं इस दुराग्रह में.....



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